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Thursday, 24 February 2011

मंच पर जमा होने लगे गठबंधन के सरपंच


मैडम की मोर्चेबंदी करने निकले छोटे चौधरी आधा दर्जन दलों को लेकर बनाया नया मंच

यूपी में आसन्न विधानसभा चुनाव देख अब फिर से सियासत के मंच पर गठबंधन के सरपंच जमा होने लगे हैं। गठबंधन के नए और पुराने सरपंच एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर सूबे में अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को खूंटी पर टांग देने के लिए तैयार हो गए। राजनीति की एक डाल से दूसरे डाल पर उछल-कूद में महारत हासिल कर चुके छोटे चौधरी अजित सिंह ने बुधवार को यहां तक कह डाला कि सिर्फ एक गुंजाइश यह नहीं है कि अब मायावती को बचाया जाय बाकी हर हथकंडे के लिए वे तैयार होकर आए हैं।

छोटे चौधरी ही क्यों? पीस पार्टी के डॉ. अय्यूब, इंडियन जस्टिस पार्टी के डॉ. उदित राज, भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर, भारतीय लोकहित पार्टी, अति पिछड़ा महासंघ, जनवादी पार्टी व उदय मंच के नेता लखनऊ के प्रेस क्लब में एक नया मंच लेकर पत्रकारों के सामने मुखातिब हुए। छोटे चौधरी समेत अपने-अपने गोल के हर चौधरियों ने कहा कि न तो उनमें कोई फासला है और न ही उनके कारवां में शामिल होने के लिए दूसरों से कोई फासला बनाया जाएगा। रालोद मुखिया को कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद भी उन्हें न तो सोनिया की शरण में जाने से गुरेज है और न ही अब सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाने में किसी प्रकार की कोई दिक्कत है। उधर कल तक मुलायम से किनारा कसने वाले और अमर सिंह के साथ गलबहिया करने वाले पीस पार्टी के नेता अय्यूब अब सपा मुखिया से बातचीत करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, अमर सिंह पहले अपनी पार्टी बनाएं बाद में बात होगी। कल्याण सिंह से निकट भविष्य में कोई सहयोग लेने की इच्छा नहीं है। सपा से बात करने के लिए हमारे रास्ते खुले हैं। दरअसल हर चुनाव के ऐन वक्त पर सभी छोटे चौधरियों का जमावड़ा अब आम बात हो गई है। पिछले चुनावों में इनका हश्र बहुत बुरा रहा है। राजनाथ सिंह ने भी अजित सिंह, सोनेलाल पटेल, ओमप्रकाश राजभर समेत तमाम वोट काटने वाले नेताओं को भाजपा का शंख बजाने के लिए एक साथ जोड़ा था मगर सबके सब डपोरशंख ही साबित हुए। अबकी बार अजित सिंह माया मेमसाहब के किले की मोर्चेबंदी करने निकले हैं। उन्होंने अपने मोर्चे के आकार और प्रकार को समझाते हुए कहा कि एक साथ आए सभी दल मकसद लेकर आए हैं। हमने एक मंच बना लिया है। अगले हफ्ते बैठकर सारी व्यूह रचना कर लेंगे। जो समझौता हम-सबने मिलकर बनाया है उसे व्यापक बनाएंगे। उसी के हिसाब से सीटें भी तय की जाएंगी। अगले हफ्ते पूरा कार्यक्रम बना लिया जाएगा। वैचारिक वैमनस्यता पर वे बोले कि गठबंधन में राजनीतिक इच्छाओं का समायोजन कर लिया जाएगा। कई गठबंधनों के अनुभव के आधार पर वह यह कहने से भी नहीं चूके कि साथ आए तमाम राजनीतिक इच्छाओं का नेतृत्व करना लगभग टेढ़ी खीर के समान है। यहां तो मैन मैनेजमेंट करना पड़ता है। अंत में बड़े दलों सपा या कांग्रेस के साथ गठबंधन के सवाल पर छोटे चौधरी ने कहा कि अभी किसी से गंभीर वार्ता नहीं हुई है। उन्होंने इशारा किया कि पहले अपना मोर्चा तो गंभीर कर लें फिर गंभीरता से उनसे गांठ बांधने की सोंचे।

Monday, 21 February 2011

यूपी और यूपीए में जगह तलाश रहे छोटे चौधरी

सपा व कांग्रेस के साथ गठजोड़ का दिया संकेत
गठबंधन का तिनका फेंक गए रालोद मुखिया

किसान नेता चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक जमीन पर हल चला रहे छोटे चौधरी अजित सिंह चुनाव करीब आते ही सत्ता के खांचे में फिट बैठने की गुंजाइश तलाशने लगते हैं। अब जबकि विधानसभा चुनाव फिर सामने है तो छोटे चौधरी की छटपटाहट जोर मारने लगी है। गुरुवार को लखनऊ आए रालोद मुखिया सूबे में चुनाव पूर्व गठबंधन को यह कह कर हवा दे गए कि उनके पसंदीदा सियासी गोट में बसपा और भाजपा फिट नहीं बैठ रहे हैं।

मतलब बिलकुल साफ है। छोटे चौधरीे सपा और कांग्रेस की ओर इशारा कर रहे हैं। दोनों में से किसी के साथ गांठ बंध जाएगी तो उन्हें किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं है। वह जिस प्रकार का राजनीतिक ढर्रा अपने शुरुआती दिनों से अपना रखे हैं उससे वे हमेशा फायदे में ही रहे हैं। इस बार वे पहले से ही डबल स्टैंडर्ड गेम का तानाबाना बुनने में लगे हैं। दरअसल तिनका फेंक राजनीति के माहिर छोटे चौधरी को मालूम है कि सपा के साथ गठबंधन का जुगाड़ लग गया तो कदाचित सरकार बनने पर फायदा मिलेगा ही और कांग्रेस उनके जाल में फंस गई तो यूपी में न सही यूपीए सरकार में जाने का रास्ता तैयार हो जाएगा। इसी मंसूबे के साथ राजधानी लखनऊ पधारे अजित सिंह गुरुवार को जब पत्रकारों से रूबरू हुए तो यह कह कर अपनी बात शुरू की कि आप लोग गठबंधन के बारे में जानने को उतावले होंगे। छोटे चौधरी अपने उतावलेपन को पत्रकारों पर थोपते हुए बोले आप लोग बयानबाजी को लेकर कयास न लगाएं। गठबंधन को लेकर अभी किसी से गंभीर वार्ता नहीं हुई है। किसी से मुलाकात भी नहीं। यहां तक कि टेलीफोन पर भी नहीं। इतनी सफाई के बाद फिर पलटते हुए उन्होंने कहा कि लोग मायावती से निजात पाना चाहते हैं। अब एक अदद विकल्पों की तलाश की दरकार है। बसपानेत्री को हराने में जो सक्षम होगा जनता उसी के साथ लामबंद होगी। अजित सिंह के इस वक्तव्य के पीछे का निहितार्थ नितांत राजनीतिक और अपने लिए जगह तलाश करने वाला है कि मायावती के साथ आने का उनका कोई मतलब नहीं तथा भाजपा इस लड़ाई से कोसों दूर है। बची सपा और कांग्रेस के जरिए चुनावी वैतरिणी पार करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। चार साल तक खामोशी साधे रहने के बाद अचानक सक्रिय हुए रालोद नेता यह कह कर भी चुनावी ताल ठोंक रहे हैं कि पश्चिमी यूपी में बसपा की लड़ाई उनसे ही है। इसलिए वे सीटों के मोल-तोल में अपने संभावित गठजोड़ वाले दलों को रालोद की अहमियत समझा रहे हैं। उन्होंने किसानों की बात नहीं की। किसानों की समस्याओं पर नहीं बोले। न ही हरित प्रदेश ही उनके मुंह से निकला। बस मायावती पर औरों की तरह हमला बोले और कहा कि माया सरकार का इकबाल खत्म हो गया है।