Friday, 19 August 2011

पारसनाथ ने ऐंठ लिए 15 लाख

पिछड़ों की सूची में शामिल करने के लिए दोसर वैश्य से की वसूली
बेटे के दहेज में मिली कार को सम्बद्ध कर ले रहे सरकारी पैसा
पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने की राज्यपाल से शिकायत

 बसपा सरकार में सिर्फ एक ही अवधपाल सिंह यादव नहीं हैं बल्कि भ्रष्टाचार में और कइयों के हाथ सने हैं। पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष एवं राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त पारसनाथ मौर्य भी उनमें से एक हैं जिन पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, यह जानने के बावजूद सूबे की मुखिया मायावती उनके कारनामों को नजरअंदाज कर आयोग के अध्यक्ष पद पर बैठाए हुए हैं। पारसनाथ के विरुद्ध भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर जातियों को पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने के नाम पर लाखों रुपए लेने का गंभीर आरोप लगा है। यह आरोप किसी सामान्य व्यक्ति ने नहीं अपितु यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव ने लगाया है कि पारसनाथ ने दोसर वैश्य जाति को पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने के नाम पर 15 लाख रुपए ऐंठ लिए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव ने राज्यपाल को लिखे पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो वकीलों संजय राजपूत व रमेश चन्द्र द्वारा पारसनाथ मौर्य पर गंभीर आरोपों का हवाला देते हुए कहा है कि आयोग अध्यक्ष ने दोसर वैश्य जाति को पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने के नाम पर लगभग 15 लाख रुपए एेंठ लिए हैं। यही नहीं श्री मौर्य ने अपनी दो बेटियों की शादी में पूरी व्यवस्था का खर्च दोसर जाति के संगठन के पदाधिकारियों से लिया है। आयोग अध्यक्ष द्वारा जिन जातियों की संस्तुतियां की गई हैं उनसे इस प्रकार धन लिया गया है। 


 श्री यादव ने राज्यपाल को यह भी लिखित शिकायत की है कि पारसनाथ के पुत्र राजीव रत्न को दहेज में प्राप्त अंबेसडर कार संख्या यूपी 32-ओजे 9805 का आयोग अध्यक्ष द्वारा अपनी पहुंच के बल पर राज्य सम्पत्ति विभाग से सम्बद्ध कराते हुए अपने साथ सम्बद्ध कराकर फर्जी यात्रा दिखाते हैं और पेट्रोल आदि का भुगतान स्वयं लेते हैं। जबकि वे यात्रा आयोग के वाहन संख्या यूपी 32 बीजी 5005 से करते हैं। पिछड़ा वर्ग आयोग अध्यक्ष ने वाहनों के जरिए भ्रष्टाचार करने की अच्छा तरकीब ढूंढ़ निकाली है। पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को यह भी बताया है कि शासन द्वारा आयोग में तैनात सचिव के उपयोग के लिए एक अंबेस्डर कार संख्या यूपी 32 बीजी 5005 वर्ष 2009 में आयोग को दी गई है। पारसनाथ मनमाने ढंग से इसका उपयोग अपने तथा परिवार के लिए करते हैं। इसके साथ ही चूंकि उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त है इसलिए इनको एक कार राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा प्रदत्त है। ईंधन आदि का व्यय विभाग द्वारा ही वहन किया जाता है। बावजूद इसके सचिव के लिए नामित कार का भी वह इस्तेमाल कर रहे हैं। आयोग के सचिव को मिली कार संख्या यूपी 32 बीजी 5005 जिसका वर्ष 2010 में पारसनाथ मौर्य के यात्रा भ्रमण के दौरान हरदोई में एक्सीडेंट हुआ था उसको बनवाने में लाखों रुपए का व्यय किया गया है। दुर्घटना की कोई एफआईआर नहीं दर्ज कराई गई जो सरकारी धन का दुरुपयोग है। पूर्व मुख्यमंत्री के अन्य आरोपों में आयोग अध्यक्ष पर सैंथवार मल्ल को पिछड़े वर्ग की सूची में अलग क्रमांक पर रखने की संस्तुति के बदले लाखों रुपए का सौदा करना भी शामिल है। जिसका साक्ष्य अंबेडकर टुडे में छपे विज्ञापन से स्पष्ट है। पारसनाथ मौर्य के विरुद्ध पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव द्वारा लगाए गए गंभीर आरापों पर राज्यपाल के विशेष सचिव एम देवराज ने पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव से जांच कराने को लिखा है। श्री यादव द्वारा लगाए गए आरोपों पर आयोग अध्यक्ष ने डीएनए से कहा कि कोई कुछ भी आरोप लगा सकता है। उन्होंने बताया कि जांच रिपोर्ट शासन को गई है।

Tuesday, 16 August 2011

माया तेरे काबीना में कैसे-कैसे मंत्री

अवधपाल के पास 200 कच्ची शराब की भट्ठियां
सरकारी विभागों से धन उगाही कराते हैं मंत्री
मंत्री अवधपाल सिंह यादव की दबंगई सिर्फ अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि दूसरे-दूसरे क्षेत्रों में भी उजागर हुई है। मसलन मंत्री जी धन उगाही का भी धंधा भी करते हैं। यहीं नहीं उनके कई और धंधों की कलई लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने यह कह कर खोल दी है कि सरकार एटा में बन रही कच्ची शराब पर जल्द रोकथाम करे और हो रहे सरकारी धन के नुकसान को रोके।

बसपानेत्री मायावती की सरकार ऐसे ही लोगों को क्लीन चिट देती है जो नख से सिख तक भ्रष्टाचार और अपराध में डूबे रहते हैं। बीते विधान सभा सत्र में पूरी की पूरी सरकार अवध पाल के गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए खड़ी दिखाई दी। ऐसे-ऐसे मंत्री अगर सरकार में रहेंगे तो जनता सुरक्षित कैसे रह सकती है यह सहज ही समझा जा सकता है। दरअसल धन उगाही का धंधा मंत्री जी का पुराना काम है। मगर यह खुलकर पहली बार सामने आया है और इसे लोकायुक्त ने भी अपनी जांच रिपोर्ट में सार्वजनिक ही नहीं किया है अपितु मुख्यमंत्री को भी बताया है कि ऐसे-ऐसे मंत्री आपने पाल रखे हैं। मंत्री रहते उन्होंने सरकारी विभाग से धन उगाही के लिए दो प्राइवेट लोगों संजू यादव व अजीत यादव को रखा है। दोनों मंत्री के प्रतिनिधि के रूप में अवध पाल के नाम पर विभागीय अधिकारियों से अनुचित कार्य करा कर धन उगाही करते हैं। शिकायतकर्ता डा. सुबोध यादव ने संजू यादव व अजीत यादव द्वारा मंत्री के नाम पर धन उगाही का शपथ पत्र तक दिया था। वहीं धन उगाही की शिकायत पर जांच कर रहे लोकायुक्त को विभागीय अधिकारियों ने भी गोपनीय तरीके से बताया है कि ये दोनों प्राइवेट प्रतिनिधि धन उगाही करते हैं। मंत्री जी का कच्ची शराब बनाने का धंधा भी प्रकाश में आया है। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों की कच्ची शराब की लगभग 200 भट्टियां खोल रखी हैं। जिनमे वे लगभग 10 हजार लीटर कच्ची शराब अपने परिवार के लोगों से बनवाते हैं। इस कच्ची शराब की बिक्री से होने वाली सम्पूर्ण आय अवधपाल व उनके भाई चन्द्र प्रताप सिंह एमएलसी, पुत्र रणजीत सिंह व भतीजे सुरजीत को जाती है। लोकायुक्त ने कच्ची शराब बनाने की शिकायत की भी जांच की है तथा जांच रिपोर्ट में उन्होंने स्वीकार किया है कि एटा में कच्ची शराब के निर्माण का कार्य गतिमान होने के कारण आबकारी विभाग और पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीम तैयार की जाय और सरकार की अभिसूचना इकाई से सूचना एकत्र कर कच्ची शराब बनवाने वाले राजनेताओं के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाई की जाय ताकि सरकार को राजस्व की हानि न हो।
विधायक निधि से कमीशन वसूला
मंत्री अवधपाल ने अपनी पूरी विधायक निधि का 95 प्रतिशत हिस्सा केवल स्कूल प्रबंधकों को निर्माण के लिए दिया है। उन्होंने इन प्रबंधकों से 50 प्रतिशत से 60 प्रतिशत कमीशन लिया है।

प्रजनन का 335 लाख खा गए अवधपाल!


गाय-भैंस के प्रजनन के पैसों को खर्च करने का आरोप
पैसा अफसर खर्च करते हैं : अवधपाल


सूबे के पशुधन एवं दुग्ध राज्य मंत्री अवधपाल सिंह यादव के अपराधों और भ्रष्टाचार की फेहरिस्त बहुत लम्बी है। दबंग मंत्री ने विभाग को ऐसा कंडम बना दिया है कि आने वाले कई वर्षो तक पशुधन व दुग्ध विकास विभाग जल्दी उबर नहीं पाएगा। वर्ष 2010-11 में राष्ट्रीय गाय-भैंस प्रजनन परियोजना के लिए मिले 980 लाख रुपयों में से 335 लाख रुपए मंत्री जी ने कहां खर्च कर दिए यह किसी को नहीं मालूम है। यही नहीं मंत्री जी अफसरों को ब्लैकमेल करने में भी बड़े उस्ताद हैं। उन्होंने पशुधन विभाग के निदेशक डा. रुद्र प्रताप पर भ्रष्टाचार के 19 गंभीर आरोप लगाए, जांच कराई और जांच रिपोर्ट की फाइल दो साल से अपने पास दबाए बैठे हैं। और ताज्जुब वाली बात ये कि निदेशक भी अपने कुर्सी पर यथावत बैठे हुए हैं।

विभागीय सूत्रों के अनुसार प्रदेश पशुधन विकास परिषद को भौतिक एवं वित्तीय प्रगति वर्ष 2010-11 में राष्ट्रीय गाय-भैंस प्रजनन परियोजना के द्वितीय चरण के लिए विभाग को कुल 980 लाख रुपए प्राप्त हुए थे। इस मद में प्राप्त धनराशि 980 लाख में से 477.610 खर्च किया गया। विभाग के 168.05 लाख रुपए शेष बचा है। खर्च धनराशि एवं शेष धनराशि 645.625 लाख रुपए ही होता है। इस मद का करीब बाकी 335 लाख रुपयों का कोई अता-पता नहीं है। मंत्री जी अपने विभाग के अफसरों से भी काम लेना बखूबी जानते हैं। पहले आरोप लगाते हैं। फिर जांच कराते हैं। और फिर अपना उल्लू सीधा करते हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार अवधपाल ने अपने ही विभाग के निदेशक डा. रुद्र प्रताप पर 19 बिन्दुओं पर गंभीर आरोप लगाए। तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता को पत्र लिखकर जांच कराया। तत्कालीन प्रमुख सचिव चंचल कुमार तिवारी ने जांच की। श्री तिवारी ने कुल सात बिन्दुओं पर पशुधन निदेशक डा. रुद्र प्रताप को गंभीर रूप से दोषी पाया।

उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रमुख सचिव पशुधन को सौंप दी। इस जांच रिपोर्ट पर प्रमुख सचिव स्तर से कोई कार्यवाई नहीं हुई। पता चला है कि इस प्रकरण की पत्रावली मंत्री जी ने अपने पास मंगाकर करीब दो साल से रख रखी है। मालुम हो कि पशुधन विभाग के वर्तमान निदेशक डा. रुद्र प्रताप के पास तीन वर्षो से निदेशक के अतिरिक्त करीब 11 अन्य चार्ज नियम विरुद्ध हस्तगत किए गए थे। विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में जैसे ही इन बिन्दुओं पर एक जनहित याचिका दाखिल कर नियमों की अवहेलना एवं भ्रष्टाचार के जांच की मांग की गई तो आनन-फानन में विभागीय प्रमुख सचिव द्वारा आदेश संख्या 1270/37-1-2011-5 (117/2007) लखनऊ दिनांक 18 मार्च 2011 द्वारा निदेशक से निदेशक के अतिरिक्त समस्त प्रभार वापस लेकर संयुक्त निदेशक प्रशासन सीआरके को हस्तगत करने का आदेश निर्गत कर दिया गया। तब विभागीय मंत्री अवधपाल द्वारा तत्कालिक रूप से लिखित आदेश जारी कर दिया गया कि प्रमुख सचिव पशुधन द्वारा जारी आदेश को निरस्त किया जाता है। मगर प्रमुख सचिव के आदेश का अनुपालन आज तक नहीं किया जा सका।

विधायक कुलदीप सिंह सेंगर विभाग में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की जांच की मांग कर चुके हैं। पता यह भी चला है कि 2007-08 एवं 2008-09 में चूजा खरीदने के क्रम में भी शासन द्वारा निर्धारित नियमों को दरकिनार कर करोड़ों रुपए की बंदरबाट करने के आरोप लगे हैं। डीएनए से सारे आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया में मंत्री अवधपाल ने कहा कि ये सारे आरोप मेरे राजनीतिक विरोधी का बेटा लगा रहा है। वह बेबुनियाद है। वह खुद अपराधी है। पैसा खर्च करने का काम अफसरों का है। निदेशक की जांच मैने कराई। थोड़े से बिन्दुओं की पुष्टि हुई है। फाइल उच्च आदेशों के लिए भेज दिया गया है।

स्कूल की जमीन जोत रहे हैं अवधपाल

ग्राम प्रधान ने किया मंत्री जी को बेपर्दा
शपथपत्र देकर अवधपाल की दबंगई का दिखाया नजारा 
कुल 12 गाटों पर अवधपाल, चंद्रपाल व अमर पाल सिंह का कब्जा


बसपा सरकार अवधपाल सिंह यादव के कारनामों पर भले ही पर्दा डाल कर क्लीनचिट दे दे मगर मंत्री जी के ग्राम प्रधान ओंमपाल सिंह यादव ने ही उन्हें बेपर्दा कर दिया है। मौजा पुराहार के रहने वाले अवधपाल ग्राम प्रधान के सगे ताऊ के बड़े लड़के भी हैं। उन्होंने शपथपूवर्क बयान दिया है कि ग्राम समाज की आबादी, नवीन परती, बंजर और नाली समेत सभी की सभी जमीनों पर दबंग मंत्री ने कब्जा कर लिया है। यही नहीं विालय की जमीन को कब्जा कर मंत्री जी दबंगई के साथ खेती भी करा रहे हैं। मुनाफा संस्था को न देकर स्वय ले रहे हैं।

मंत्री जी के खिलाफ ताल ठोंक कर बोलने वाले ग्राम प्रधान ओंमपाल ने कहा है कि मौजा पुराहार बुलाकी नगर तहसील व ब्लॉक अलीगंज के गाटा संख्या 7, 53, 10, 5, 19, 52 और 49 जिन पर राजस्व अभिलेखों में आबादी, नवीन परती, बंजर, नाली और चक मार्ग दर्ज है उन पर अवधपाल सिंह यादव ने कब्जा कर रखा है। गाटा संख्या 7 पर अवधपाल का मकान बना हुआ है। इसमें वह खुद रहते हैं। इस गाटा संख्या का 30 डिसमल भाग गांव सभा का है जो इनके मकान में शामिल है। गाटा संख्या 53, 10, 5, 19, 52 और 49 गांव सभा की जमीन है। इन गाटा संख्याओं की जमीन पर मंत्री ने कब्जा कर रखा है। ग्राम प्रधान ने कहा है कि गाटा संख्या 92/2.45, 96 ख, 105 क, 71 ख, 46, 220 और 290 पर हम लोगों के पट्टे निरस्त होने के बाद से बराबर अवधपाल सिंह कब्जा किए हुए हैं। और तार फेसिंग भी कर ली है। यह सब भूमि पट्टे निरस्त होने के बाद ग्राम सभा की है। लेकिन कब्जा मंत्री का है।

ग्राम प्रधान के अनुसार गाटा संख्या 71 ग की कुल भूमि करीब दो हेक्टेयर से कुछ ऊपर यानि 25 बीघा के करीब है और इस पर अवधपाल सिंह का कब्जा है। ईंट भट्ठे की पिच बनी है। कुछ हिस्से पर मंत्री के नाम का पट्टा है जो गलत है। ग्राम प्रधान ने बताया है कि श्रीकृष्ण लक्ष्मण उच्चतर माध्यमिक विालय पुराहार बुलाकी नगर का भवन विालय की जमीन पर न होकर हमारे परिवार के लोगों की निजी जमीन पर बना हुआ है। विालय की जमीन पर मंत्री खेती करा रहे हैं। लाभ संस्था को न देकर स्वयं ले रहे हैं। इस प्रकार गांव पुराहार बुलाकी नगर की खसर संख्या 96 क, 102 क, 105 क, 107 क, 130, 132 क, 187 ग, 203 क, 204, 219, 293 ख व 311 क समेत कुल 12 गाटों यानि 6.6770 हेक्टेयर जमीन पर अवध पाल सिंह यादव समेत उनके भाई चन्द्रपाल सिंह यादव, अमर पाल सिंह यादव तथा अध्यक्ष प्रा. समिति श्रीकृष्ण लक्ष्मण विालय पर कब्जा है।

Friday, 12 August 2011

नवनीत सहगल से पावरफुल कौन!

भूकेश ने सी एंड डीएस में किया था 185 करोड़ का घपला
सहगल समेत तीन आईएएस के खिलाफ राज्यपाल से मुकदमा चलाने की मांग
भ्रष्ट इंजीनियर पीके भूकेश को बना दिया सी एंड डीएस का निदेशक



लखनऊ। मुख्यमंत्री के सचिव और वरिष्ठ आईएएस अफसर नवनीत सहगल भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने के फन में भी माहिर हैं। अब देखिए न उन्होंने जल निगम के अध्यक्ष रहते भ्रष्ट इंजीनियर पीके भूकेश को निगम की निर्माण इकाई सी एंड डीएस यानि कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज का निदेशक बना दिया। जबकि सहगल साहब के पास यह पावर ही नहीं कि वे जल निगम के बतौर अध्यक्ष रहते किसी अफसर को निदेशक बना दें। मगर यह तो उनके बाएं हांथ का खेल है। पावर हो या न हो। उन्हें किसी पावर की जरूरत नहीं पड़ती है। माया मेमसाहब के रहते उनसे ज्यादा पावरफुल कौन है?

हिंदनगर कानपुर रोड निवासी महेन्द्र शुक्ल ने राज्यपाल को एक पत्र लिख कर तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल, एसआर लाखा, तथा अमल कुमार वर्मा की भ्रष्टाचार में संलिप्तता उजागर होने की बात कही है। उन्होंने इन तीनों अफसरों के विरुद्ध मुकदमा चलाने की मांग की है। जल निगम के अधीक्षण अभियंता शिकायत एके सिंह ने आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में बताया है कि कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज के मौजूदा निदेशक पीके भूकेश को कर्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वहन न करने, नियमों के अनुकूल काम न करने, निर्माण कार्यो में अनियमितता, आर्थिक क्षति पहुंचाने तथा विभाग की छवि धूमिल करने के मामले में दोषी पाए जाने पर वर्ष 2007 में बर्खास्त कर दिया गया था। तत्कालीन जल निगम के अध्यक्ष और मंत्री मो. आजम खां ने बर्खास्तगी का आदेश दिया था। मौजूदा निदेशक और इंजीनियर पीके भूकेश पर 185 करोड़ रुपए के हेरफेर का आरोप है। मालूम हो कि भ्रष्ट इंजीनियर और सी एंड डीएस के निदेशक पीके भूकेश के भ्रष्टाचार की जांच तत्कालीन वित्त निदेशक वीडी दोहरे, पूर्व मुख्य सचिव रविशंकर माथुर, आईएएस टीजार्ज जोसेफ, नगर विकास के सचिव डीसी मिश्रा, स्थानीय निकाय की निदेशक रेखा गुप्ता, विशेष सचिव एसपी मिश्रा द्वारा की गई। सभी अफसरों ने इंजीनियर पर लगे आरोपों को सिद्ध पाया और सभी ने कठोर कार्रवाई की संस्तुति की।

मगर दोष कितना भी हो अगर उसके पीठ पर बड़ों का हाथ है तो कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यह साबित किया पीके भूकेश ने। अब देखिए असली खेल। तत्कालीन प्रमुख सचिव एसआर लाखा ने 9 जुलाई 2008 के दिन भूकेश को सेवा में बहाली का आदेश पारित कर दिया। बाकी का काम पूरा किया मुख्यमंत्री के सचिव और जल निगम के अध्यक्ष नवनीत सहगल ने। उन्होंने उसे 2 जुलाई 2009 को सी एंड डीएस का निदेशक बना दिया। शिकायतकर्ता महेन्द्र शुक्ला का कहना है कि सहगल ने भ्रष्ट इंजीनियर को निदेशक पर तैनाती नियमों के विपरीत जाकर की है। उन्हें निगम के अध्यक्ष रहते यह अधिकार ही नहीं है। श्री शुक्ल ने बताया कि 2007 में एक अधिनियम बनाया गया है कि जल निगम के अध्यक्ष का पद लाभ का पद नहीं समझा जाएगा। उसका निगम के प्रबंधकीय कृत्यों पर कोई अधिकार नहीं होगा। निगम के प्रबंधकीय कामों का निष्पादन प्रबंध निदेशक और निगम के अन्य अधिकारियों के नियंत्रण में होगा। शिकायतकर्ता ने कहा कि तब कैसे नवनीत सहगल ने भ्रष्ट इंजीनियर को सी एंड डीएस का निदेशक तैनात कर दिया।

Wednesday, 10 August 2011

भ्रष्टाचार में फलफूल रहे फूलबाबू !


रिकवरी के पैसों को खा गए अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम के अफसर

 विधायक निधि के दुरुपयोग में फंसे अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ राज्य मंत्री फूलबाबू समेत उनके विभाग के तमाम छोटे से लेकर बड़े अफसर तक भ्रष्टाचार में फल-फूल रहे हैं। अल्पसंख्यक वित्तीय एवं विकास निगम लि. में आलम यह है कि शायद ही कोई ऐसा अफसर और कर्मचारी होगा जिसने भ्रष्टाचार की गंगा में न नहाया हो। मंत्री जी के खिलाफ तो शिकायतें ऐसी-ऐसी हैं जिसे सुनकर होश फाख्ता हो जाते हैं। एक शिकायतकर्ता ने तो लोकायुक्त को लिखे पत्र में यहां तक कहा है कि मंत्री जी जागते में भी सोते दिखते हैं। वे बगैर दलालों के बात नहीं करते। जिला बिजनौर स्थित कम्प्यूटर सेंटर चलाने वाले परवेज अख्तर ने लोकायुक्त को लिखे शिकायती पत्र में कहा है कि मंत्री फूलबाबू जागते में भी सोते दिखते हैं। उनके पास पहुंचते ही एक सरकारी और एक प्राइवेट दलाल कमीशन की बात तय करते हैं। उसी के अनुसार मंत्री जी राजी होते हैं। जब किसी अधिकारी के खिलाफ कोई मामला कार्रवाई के लिए आता है तो पहले मंत्री जी के यहां भरपूर रिश्वत खाई जाती है। फिर अगले दिन से उस अधिकारी को मंत्री अपना रिश्तेदार बताने लगते हैं। शिकायतकर्ता परवेज ने आरोप लगाते हुए फूलबाबू के अधीनस्थ कार्य करने वाले भ्रष्ट अफसरों की करतूतों को बेनकाब किया है। उसके गंभीर आरोपों की फेहरिश्त में अल्पसंख्यक वित्तीय एवं विकास निगम के प्रबंधक मसऊद अख्तर का नाम भी है। निगम के एक रिकवरी सहायक परमानंद की मौत से जुड़े मामले का उल्लेख करते हुए परवेज ने लिखा है कि मसऊद अख्तर ने उसे रेगुलर करने का लालच देकर फर्जी रशीदों के माध्यम से 11 लाख रुपए प्राप्त किया तथा घर का व्यक्तिगत काम कराते रहे। निगम के एक और बड़े अफसर लईक अहमद ने भी परमानंद को लालच देकर फर्जी रसीदों के माध्यम से 70 हजार रुपए ले लिए। फील्ड आफीसर अब्दुल कादिर ने मृतक रिकवरी सहायक से 65 हजार रुपए तो लिए ही हजारों रुपए का गेहूं, चावल लिया तथा सालों घर पर नौकर की तरह रात 12 बजे तक काम लेते रहे। लोकायुक्त को लिखे पत्र में कहा गया है कि तीनों बड़े अफसरों द्वारा रिकवरी सहायक को रेगुलर करने के नाम पर ब्लैक मेल करने तथा उल्टा उसे ही फसाने के सदमें से उसकी मौत हो गई। शासन के उप सचिव मो. शफीक ने दो मार्च 2010 को तत्कालीन प्रबंध निदेशक को लिखे पत्र में निर्देश दिया था कि मृतक परमानंद के मामले में जांच उपरांत नियमानुसार कार्रवाई की जाय। रिकवरी सहायकों से पैसा वसूलने का धंधा यहीं तक सीमित नहीं है। एक और वसूली सहायक राजेश मान सिंह तथा सहायक रामरेखा प्रसाद ने पांच फरवरी 2010 को एक पत्र अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को लिखा जिसमें कहा गया कि लखनऊ तथा आसपास वसूली करने से मिली रकम में से आधा संयुक्त प्रबंध निदेशक लईक अहमद ले लेते थे। राजेश मान सिंह ने प्रमुख सचिव को बताया कि लईक ने उससे डेढ़ लाख रुपए ले रखा है। फील्ड आफीसर खुर्शीद अहमद भी लगभग 60 हजार रुपए रिकवरी के ले चुके हैं। मृतक परमानंद ने भी तीनों बड़े अफसरों के खिलाफ फर्जी रसीदों को उपलब्ध कराकर लाखों रुपए लेने का आरोप लगाया था। निगम के एक ड्राइवर विकास चन्द्र भारती ने लईक अहमद के खिलाफ मुख्यमंत्री से शिकायत भी की है। जब फूलबाबू से उनके फोन न. 9415607716 पर सम्पर्क किया गया तो घंटी बजती रही लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

Monday, 8 August 2011

3000 करोड़ के घेरे में शशांक शेखर!

राज्यपाल से हवाई जहाज व हेलीकॉप्टरों की खरीद में घपले की शिकायत


नागरिक उड्डयन विभाग के पूर्व  क्लर्क को जानमाल के खतरे का अंदेशा
नागरिक उड्डयन विभाग व लखनऊ एयरपोर्ट में 3000 करोड़ के घोटाले की शिकायत राजभवन तक पहुंच गई है। शिकायतकर्ता कोई और नहीं बल्कि नागरिक उड्डयन विभाग से हटाए गए एक बाबू देवेन्द्र कुमार दीक्षित ने ही कैबिनेट सचिव शशांक शेखर का नाम लिए बिना आरोप लगाया है कि लगभग 3000 करोड़ के घोटाले में प्रदेश शासन में सर्वोच्च पद पर बैठा यह अफसर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से संलिप्त है। वे अपने पद, पहुंच एवं धनबल के प्रभाव से आरटीआई के तहत घोटाले से सम्बंधित सूचनाएं उपलब्ध नहीं कराने दे रहे हैं। राज्यपाल से अपने जानमाल के खतरे का अंदेशा जताते हुए कहा है कि उसकी या उसके परिवार की हत्या कराई जा सकती है।

श्री दीक्षित ने राज्यपाल को दी शिकायत में कहा है कि उसने आरटीआई के तहत जिन बिन्दुओं पर सूचनाएं नागरिक उड्डयन विभाग से मांगी हैं उसकी जांच किसी निष्पक्ष जांच एजेंसी या सीबीआई से कराई जाय। नागरिक उड्डयन विभाग में 1987 से लेकर 2002 तक क्लर्क के पद पर नौकरी करने वाले शिकायतकर्ता ने कहा है कि विभाग और लखनऊ एयरपोर्ट में घोर भ्रष्टाचार व्याप्त है। वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताओं एवं देशद्रोही गतिविधियों के संचालन का विरोध 1988 से किया जाता रहा है। इसके लिए अधिकारियों द्वारा षड्यंत्र के तहत उसे उत्पीड़ित किया गया। फर्जी मुकदमों में फसाने के साथ-साथ उसे असंवैधानिक तरीके से सेवा से पृथक कर दिया गया। इससे सम्बंधित एक मुकदमा वाद संख्या 7191(एस/एस) 2002 इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है।

उल्लेखनीय है कि नागरिक उड्डयन विभाग से सेवामुक्त क्लर्क ने विभाग के प्रमुख सचिव के जनसूचना अधिकारी से आरटीआई के तहत एक जनवरी 2007 से 31 जुलाई 2010 तक के मध्य त्यागपत्र देने वाले या वीआरएस लेने वाले पायलट व अभियंताओं के नाम, हवाई जहाज व हेलीकॉप्टरों के क्रय हेतु स्वीकृत धन, आहरित धन, क्रय आदेश, बेचे गए हवाई जहाज और हेलीकॉप्टरों की संख्या, बेचने के कारण, बेचने में अपनाई गई प्रक्रिया, यूपी सरकार के अधीन हवाई पट्टियों के निर्माण, रख-रखाव के लिए स्वीकृत धन, राजकीय नागरिक उड्डयन विभाग व लखनऊ एयरपोर्ट के पास उपलब्ध वाहनों की संख्या आदि की विस्तृत सूचना मांगी है। नागरिक उड्डयन विभाग से हटाए गए शिकायतकर्ता क्लर्क ने डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट को बताया कि 1989 में विभागीय निदेशक शशांक शेखर के रहते चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती में भी घोटाला हुआ था। इसके साथ ही उसने आरटीआई के तहत नागरिक उड्डयन विभाग के जनसूचना अधिकारी से चतुर्थ श्रेणी कर्मियों व 1989 में वर्क सुपरवाइजरों के पद पर हुए साक्षात्कार, पद की संख्या, बुलाए गए अभ्यर्थियों की संख्या, उपस्थित हुए अभ्यर्थियों की संख्या तथा चयनित अभ्यर्थियों की संख्या की जानकारी मांगी है। यही नहीं उसने वर्तमान में राजकीय नागरिक उड्डयन विभाग के निदेशक के पद की अनिवार्य योग्यता, यूपी एयर सर्विसेज सोसाइटी के अधिकारियों की चल एवं अचल सम्पत्ति की सूचना मांगी है। शिकायतकर्ता ने बताया है कि कार्यालय प्रमुख सचिव नागरिक उड्डयन विभाग के जनसूचना अधिकारी द्वारा उसे कोई सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। इसकी शिकायत उन्होंने यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह पंकज से की है। सीआईसी ने सूचना न दिए जाने के लिए विभाग के जनसूचना अधिकारी के खिलाफ 25 हजार रुपए जुर्माने की नोटिस भेजी है।