Thursday, 31 March 2011

सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो की गुलामी नहीं करेगा कल्याण निगम

खाद्य व रसद विभाग के प्रमुख सचिव को लिखी चिट्ठी

कर्मचारी कल्याण निगम सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो का सरकारी अंकुश बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। वह ब्यूरो से अलग होने के लिए छटपटा रहा है। निगम ने खाद्य एवं रसद विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो से आजाद कर देने की गुहार लगाई है।सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक निगम के अधिशासी निदेशक रमेश चन्द्र मिश्र ने खाद्य एवं रसद विभाग के प्रमुख सचिव को लिखे पत्र में कहा है कि राज्य कर्मचारियों की भलाई के लिए सरकार द्वारा एक स्कीम बनाई गई जिसके तहत स्टाफ वेलफेयर बोर्ड का गठन किया गया था। इस बोर्ड के सभी निदेशक सरकारी अधिकारी हैं। ठीक इसी प्रकार कर्मचारी कल्याण निगम के गठन के समय भी उसे पूर्णत: वित्त पोषित किए जाने का निर्णय लिया गया था। एक ही मद में वेतन भत्तों के भुगतान के कारण भी स्टाफ वेलफेयर बोर्ड व कर्मचारी कल्याण निगम की सेवा शर्तो में भिन्नता की जाती है। यही नहीं निगम और बोर्ड में कर्मचारियों के सेवानिवृत्त की आयु में भी अन्तर है। सभी शर्ते समान होने की स्थिति में सेवा शर्तो में भी एकरूपता होनी चाहिए। प्रमुख सचिव से निगम के प्रति भेदभाव की ओर इशारा करते हुए अधिशासी निदेशक ने कहा कि निगम मानकर ही सेवा शर्तो में अंतर किया गया है। जबकि निगमों का गठन कम्पनीज एक्ट 1956 के तहत किया जाता है। इसमें राज्य सरकार का 51 प्रतिशत हिस्सा होता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित खाद्य एवं रसद विभाग, सार्वजनिक उद्यम विभाग, न्याय विभाग की कमेटी ने यह स्वीकार किया था कि कर्मचारी कल्याण निगम सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो की परिधि में नहीं आता है। 5 अगस्त 2008 को उच्च स्तरीय समिति की बैठक में अधिशासी निदेशक ने निगम की ओर से पक्ष रखते हुए कहा था कि निगम शासन द्वारा पूर्णतया वित्त पोषित है। इसका उद्देश्य सामान्य दर पर कर्मचारियों को आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना है। लाभ का उद्देश्य न होने के कारण ही कर्मचारी कल्याण निगम के तहत आने वाले सचिवालय खान-पान को उम ब्यूरो की परिधि से बाहर करने का निर्णय लिया जा चुका है। इसलिए निगम को भी ब्यूरो से अलग किया जाना चाहिए।

उच्च स्तरीय बैठक में सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि कर्मचारी कल्याण निगम घाटे में रहता है और इसमें कई वर्षो से बैलेंस शीट नहीं बनाई गई है। जब तक निगम ब्यूरो की परिधि में है तब तक इसके कर्मचारियों को पंचम वेतनमान आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप सुविधाएं नहीं दी जा सकती हैं। ब्यूरो के निदेशक ने कहा कि फिलहाल इस निगम को ब्यूरो की परिधि से बाहर किए जाने में उसे कोई आपत्ति नहीं है। राज्य सरकार निगम को अलग कर सकती है।

समिति में शामिल खाद्य रसद विभाग के प्रमुख सचिव जैकेब थामस, सार्वजनिक उम ब्यूरो के निदेशक जीसी शुक्ल, उप सचिव सीपी सिंह, अपर विधि परामर्शी सुधीर चन्द्र श्रीवास्तव, विशेष सचिव चन्द्र प्रकाश, निगम के अधिशासी निदेशक रमेश चन्द्र मिश्र, मुख्यमंत्री के सचिव कामरान रिजवी व संयुक्त सचिव बी राम शास्त्री ने निगम को ब्यूरो से अलग करने की सहमति जताई थी। मगर आज तक निगम राज्य सरकार के बार-बार गुहार लगाने के बावजूद भी उसे ब्यूरो से मुक्त नहीं किया जा रहा है।

Wednesday, 30 March 2011

आमोद-प्रमोद में डूबे मंत्री

फरवरी में ही 107 प्रतिशत मनोरंजन कर की वसूली
ब्रेन स्टोर्मिंग कर नए आमोद के स्रोत ढूंढ़े जाएंगे

मनोरंजन कर विभाग के अफसर मंत्री नकुल दुबे का भरपूर मन-रंजन कर रहे हैं। मंत्री के दूसरे विभागों में भी इस समय जबरदस्त वसूली चल रही है। मगर मनोरंजन कर विभाग के क्या कहने? सिर्फ फरवरी महीने में ही शत-प्रतिशत वसूली कर अफसरों ने उन्हें आमोद-प्रमोद में डुबो दिया है। मंत्री जी इतने गदगद हैं कि उन्होंने केबिल संचालन में आ रही गड़बड़ियों के खिलाफ जांच कराने का फरमान जारी कर दिया है। यही नहीं वे अप्रैल में होने वाली समीक्षा बैठक के दूसरे दिन ब्रेन स्टोर्मिग सत्र आयोजित कर आमोद के नए dोत ढूंढें़गे।

बीती नौ मार्च को मंत्री जी जब विभागीय समीक्षा करने बैठे थे तो मनोरंजन कर विभाग के अफसरों ने शत-प्रतिशत वसूली दिखा कर बाग-बाग कर दिया। अफसरों ने बताया कि फरवरी महीने में ही केवल 107 प्रतिशत वसूली हुई है। पिछले साल जब इसी महीने में समीक्षा बैठक हुई थी तो तबसे अब तक कर में 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। मंत्री ने कहा कि यह वृद्धि और तेज की जाय तथा पूरे प्रदेश को पांच जोन में बांट कर मुख्यालय के अफसरों से केबिल लेखा मिलान की आकलन तालिका एवं केबिल सेवा में एकमुश्त समाधान योजना की जांच कराई जाय। उन्होंने कहा है कि जिन जिलों में कमियां पाई जाएंगी, वहां के मनोरंजन कर निरीक्षकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। विभागीय सूत्र बताते हैं कि मंत्री ने अलीगढ़ जिले में प्राप्त शिकायत पर मुख्यालय से एक टीम भेज कर आमोद एवं मनोरंजन कर निरीक्षकों की वित्तीय वर्ष 2010-11 के समस्त कार्यो व उपलब्धियों की जांच करने को कहा है। मुरादाबाद में केबिल सेवा में एकमुश्त समाधान योजना का विकल्प चुनने वाले केबिल ऑपरेटरों की समाधान योजना के आदेशों का शत-प्रतिशत पुनरीक्षण 31 मार्च तक करने को भी कहा है। 107 प्रतिशत की वसूली के बावजूद भी मंत्री केबिल लेखा मिलान से संतुष्ट नहीं हैं। वे शायद इसलिए इस पर जोर दे रहे हैं कि सबसे ज्यादा गड़बड़ियां केबिल संचालन में हैं। ऑपरेटर केबिल उपभोक्ताओं की पूरी जानकारी जिला मनोरंजन कर अधिकारी को नहीं देते हैं। दरअसल मनोरंजन कर अधिकारी ही ऑपरेटरों से मिले होते हैं और वे वास्तविक संख्या को कमीशनखोरी के चलते सामने नहीं आने देते हैं। विभाग के विशेष सचिव वीरेन्द्र प्रताप सिंह ने जिलाधिकारियों, मनोरंजन कर आयुक्त समेत सभी मनोरंजन कर निरीक्षकों को पत्र लिखकर कहा है कि अप्रैल की समीक्षा बैठक के दूसरे दिन मुख्यालय में ब्रेन स्टोर्मिग सत्र आयोजित कर इस बात पर विचार-विमर्श किया जाएगा कि मनोरंजन कर से प्राप्त होने वाली आय में अधिकाधिक वृद्धि के लिए आमोद के कौन से नए dोत हो सकते हैं। वर्तमान में प्रचालित आमोद के dोतों से शत-प्रतिशत मनोरंजन कर कैसे प्राप्त किया जा सकता है? विशेष सचिव ने कहा है कि जिलों में अधिकारियों और मनोरंजन कर निरीक्षक बिना किसी पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहते हैं। मार्च चूंकि इस वित्तीय वर्ष का अंतिम महीना है इसलिए बिना किसी अपरिहार्य कारण के कोई भी अधिकारी व मनोरंजन कर निरीक्षक अवकाश न लें। फरवरी में मंत्री ने विभाग का लक्ष्य 20.27 करोड़ रुपए निर्धारित किया था जिसके सापेक्ष 21.27 करोड़ यानि 107 प्रतिशत कर वसूली अफसरों ने की है।

Tuesday, 29 March 2011

भ्रष्टाचार के फावड़े से तालाब खोदेंगे अफसर


केंद्र ने खारिज कर दिया राज्य के अरबों रुपए का प्रस्ताव



लखनऊ। राज्य सरकार ने अब यूपी में भ्रष्टाचार के फावड़े से तालाब खोदने की तरकीब ढूंढ़ निकाली है। भूगर्भ जल विभाग के अफसर 124 विकास खंडों में पानी की दिक्कत दूर करने के लिए 952.63 करोड़ खर्च करने का खाका तैयार किए बैठे हैं। इन पैसों से वे वर्षा का जल संचय करेंगे। पिछले साल भी अधिकारी मनरेगा के 1197 करोड़ रुपए खर्च कर भ्रष्टाचार का तालाब खोदते रहे मगर पानी के संकट से निजात नहीं दिला पाए थे। अबकि बार केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के मंसूबों को देखते हुए ही अरबों के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर जोर का झटका दिया है। भूगर्भ विभाग के सूत्रों के मुताबिक उसने प्रदेश में 124 विकास खंडों में जल संचयन एवं रिचार्ज योजनाओं की रूपरेखा लगभग तैयार कर ली है। इसके लिए विभाग ने जिलों से प्राप्त सूचनाओं को आधार मानकर 952.63 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना कागजों पर तैयार कर ली है। मनरेगा के इन पैसों से अफसर भूमि संरक्षण, मेड़ बंदी, तालाबों का निर्माण, जीर्णोद्धार, चेक डैम, रिचार्ज पिट, वनीकरण, पीजोमीटर का निर्माण तथा जनजागरण किए जाएंगे। विभाग ने विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में गठित तकनीकी समन्वय समिति से करोड़ो के धन के लिए अनुमोदन भी करा लिया है। मगर सबसे चौकाने वाली बात यह है कि विभाग और विभाग के प्रमुख सचिव सुशील कुमार के आंकड़ों में ही विरोधाभास की स्थिति है। डीएनए ने जब उनसे पूछा कि यूपी में कुल कितने विकास खंड पानी से संकटग्रस्त हैं, तो उन्होंने बताया कि 200 से अधिक विकासखंडों में भूजल की समस्या है। वहीं विभाग 124 विकास खंडों में पानी के संकट के आंकड़े बनाए बैठा है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष केलिए राज्य सरकार ने मनरेगा के पैसों से तालाब वगैरह खुदवाने का जो प्रस्ताव केंद्र को भेजा है, उसे केंद्र सरकार औपचारिक रूप से मानने को तैयार ही नहीं हो रही है। प्रमुख सचिव ने भी यह स्वीकार किया है कि केंद्र, राज्य सरकार के आंकड़ों को नहीं मान रही है। दरअसल मनरेगा के पैसों में लगातार हो रहे घपलों की शिकायतों से केंद्र अब चौकन्ना हो गया है। प्रमुख सचिव ने बताया कि पिछले साल 1197 करोड़ रुपए पानी से संकटग्रस्त विकासखंडों में खर्च करने के लिए केंद्र सरकार ने दिया था। मगर पानी की समस्या इस साल भी जस की तस बनी हुई है। मनरेगा के पैसों के दुरुपयोग की ही वजह से केंद्र ने जलसंचयन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। भूगर्भ विभाग के अनुसार आगरा के बरौली अहीर, मथुरा के नौझील, हाथरस के सादाबाद, सहपऊ, सासनी, एटा के मरहरा, सकीत व कासगंज, बागपत के बिनौली व पिलाना, बरेली के आलमपुर जाफराबाद, बदायूं के अम्बियापुर, आसफपुर, बिसौली, जगत, जुनावई, रजपुरा, सहसवान व सलारपुर, देवरिया के भाटपार रानी, फरुखाबाद के बढ़पुर, लखनऊ के माल, मुरादाबाद के बहजोई, डिंगरपुर व सम्भल, बिजनौर के जलीलपुर, रामपुर के चमरौहा, जेपी नगर के गजरौला, गंगेश्वरी व हसनपुर, मुजफ्फरनगर के साहपुर व ऊन, सहारनपुर के गंगोह, नकुर व ननीता आदि क्षेत्रों में भूजल का जबरदस्त संकट है।

ईमानदारी दिखाई तो नौकरी गंवाई!


चन्द्रशेखर आजाद कृषि विवि के रिसर्च इंजीनियर ने की थी यह खता


यूपी के विश्वविद्यालयों में भी भ्रष्टाचार की जड़ें काफी मजबूती के साथ पैठ बना चुकी हैं। मंत्रियों व ऊंचे ओहदों पर बैठे अफसरों के जरिए बनने वाले  विश्वविद्यालयों के कुलपति शैक्षिक माहौल बनाने के बजाय लूट-खसोट करना अपनी बपौती मान बैठते हैं। शहीदे आजम चन्द्रशेखर आजाद के नाम पर कानपुर में स्थापित कृषि विश्वविालय में तत्कालीन कुलपति डॉ. एसबी सिंह के खिलाफ विवि के ही रिसर्च इंजीनियर टीसी मिश्र ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव अंखड प्रताप सिंह ने उन्हें ही विवि की सेवा से बाहर करवा दिया और अंततोगत्वा कहीं से न्याय भी नहीं मिलने दिया। चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार का यह मामला आरटीआई के जरिए प्रकाश में आया है। वर्ष 2007 में विवि के रिसर्च इंजीनियर टीसी मिश्र ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में लिखा है कि तत्कालीन कुलपति डॉ. एसबी सिंह ने मुख्य कार्मिक अधिकारी डॉ. डीएन शर्मा व अधिष्ठाता डॉ. केडी उपाध्याय के जरिए भ्रष्टाचार की झड़ी लगा दी। कुलपति ने इन अधिकारियों को पुरस्कार में इनके पुत्रों को अवैध तरीके से विवि में नियुक्त कर दिया। श्री मिश्र ने कहा कि मुख्य कार्मिक अधिकारी डॉ. डीएन शर्मा के पुत्र संजीव शर्मा का विषय वस्तु विशेषज्ञ पद के लिए साक्षात्कार पत्र एवं नियुक्ति आदेश डॉ. शर्मा के हस्ताक्षर से जारी किया जाना इस आरोप की पुष्टि करता है कि इस पूरी चयन प्रक्रिया में नैतिकता के सभी मापदंडों को तिलांजलि दे दी गई। विश्वविद्यालय द्वारा निकाले गए विज्ञापन में कम्प्यूटर प्रोग्रामर के पद भी विज्ञापित किए गए थे। बीटेक (कम्प्यूटर साइंस) व एमएससी योग्यताधारी किसी अभ्यर्थी को इस पद के उपयुक्त नहीं पाया गया। जिस कारण पूर्व निर्धारित योग्यता को शिथिल कर दूसरे विज्ञापन प्रकाशित किए गए। रिसर्च इंजीनियर ने अपने आरोपों में कहा कि डॉ. केडी उपाध्याय के लड़के कैलाश उपाध्याय की कम्प्यूटर प्रोग्रामर पर की गई नियुक्ति भी अवैध है। उनका कम्प्यूटर प्रशिक्षण सम्बंधी प्रमाण पत्र वास्तविक नहीं है। कैलाश का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा सम्बंधी प्रमाण पत्र फर्जी है एवं वर्ष 2002 के बाद जालसाजी के माध्यम से प्राप्त किया गया है। इसी प्रकार कम्प्यूटर प्रोग्रामर पद पर नियुक्त किए गए अविनाश कुमार एवं राहुल देव के भी पोस्ट ग्रैजुएट के प्रमाण पत्र जालसाजी द्वारा तैयार किए गए प्रतीत होते हैं जिस कारण इनकी भी नियुक्ति अवैध है। मिस विदुषी कटियार की भी कम्प्यूटर प्रोग्रामर पद पर नियुक्ति की गई है। इनके पास कम्प्यूटर डिप्लोमा प्रमाण पत्र है जबकि वांछित योग्यता पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा है। वहीं विवि ने अपने एक आदेश के जरिए कृषि ज्ञान केंद्रों पर नियुक्त किए गए 12 लोगों को कानपुर मुख्यालय बुला लिया है जिनमें कम्प्यूटर प्रोग्रामर पद पर नियुक्त सभी अभ्यर्थी शामिल हैं जबकि इनकी सेवाओं की जरूरत नहीं है। रिसर्च इंजीनियर के आरोपों पर विशेष सचिव धीरज साहू ने आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों को लेकर चन्द्रशेखर आजाद कृषि विवि के कुलपति से स्पष्टीकरण मांगा और कहा कि संजीव शर्मा के साक्षात्कार बोर्ड में उनके पिता डीएन शर्मा भी सदस्य या अध्यक्ष थे? अभ्यर्थियों द्वारा जिन संस्थाओं का पीजीडीसीए का प्रमाण पत्र दिया है, क्या वह संस्थाएं यह कोर्स चलाने के लिए सक्षम हैं? अब यह मामला सूचना आयोग पहुंच चुका है।

Sunday, 27 March 2011

लोकायुक्त की तत्परता से सरकार परेशान

हरगांव नगर पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ मुख्य सचिव को प्रत्यावेदन

लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा भ्रष्टाचार की शिकायतों पर तत्परता से जांच ही नहीं करते बल्कि कार्रवाई के लिए शासन को भी तुरंत लिखते हैं। भ्रष्टाचार में आरोपित मंत्रियों के बाद लोकायुक्त ने अब पंचायतों में आ रही भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार को लगातार प्रत्यावेदन भेज रहे हैं। लाखों रुपयों के सरकारी धन के दुरुपयोग संबंधी एक मामले में उन्होंने सीतापुर जिले के हरगांव नगर पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ मुख्य सचिव को प्रत्यावेदन भेज कर सख्त कार्रवाई की संस्तुति की है।

न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से राज्य सरकार निश्चित रूप से सकते में हैं। शायद इसीलिए लोकायुक्त द्वारा भेजे प्रत्यावेदनों पर बमुश्किल कार्रवाई की औपचारिकता पूरी की जाती है। सीतापुर जिले के हरगांव नगर पंचायत अध्यक्ष ने 15 सफाई कर्मियों की नियम विरुद्ध नियुक्तियां ही नहीं की बल्कि सात महीने का वेतन भी आहरित करवा लिया। विुत उपकरण खरीद के नाम पर लाखों रुपए डकार गए। कमीशनखोरी के चक्कर में नगर पंचायत अध्यक्ष ने विुत उपकरणों की खरीद संबंधित निविदा दो दिन पहले ही खोल दी। शिकायतकर्ता संकट मोचन मिश्र ने नगर पंचायत अध्यक्ष पर लिपिक जय प्रकाश अवस्थी की मिलीभगत से बोर्ड में प्रस्ताव लाकर विुत उपकरणों की खरीद में 40 लाख रुपयों को गोलमाल करने तथा कमीशनखोरी का आरोप लगाया है। लोकायुक्त ने अपनी जांच में यह स्वीकार किया है कि विुत उपकरणों की खरीद में मोहरबंद निविदाएं जो 24 फरवरी 2007 को खुलनी थीं, वह दो दिन पूर्व ही खोल दी गईं। यही नहीं नगर पंचायत अध्यक्ष ने 15 सफाई कर्मचारियों की नियम विरुद्ध नियुक्ति कर दी और डीएम को सूचना भी नहीं दी।

लोकायुक्त ने मुख्य सचिव को भेजे प्रत्यावेदन में कहा है कि नगर पंचायत अध्यक्ष बोर्ड के प्रस्तावों की प्रति जिलाधिकारी ही नहीं बल्कि मंडलायुक्त और नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव को भी नहीं भेजते हैं। विुत उपकरणों की खरीद का भुगतान बिना किसी अभियंता के सत्यापन के ही कर दिया। वहीं शिकायतकर्ता का कहना है कि नगर पंचायत अध्यक्ष जनता में भय दिखाने के लिए प्राइवेट चार से पांच असलहाधारियों को रखते हैं और हजारों रुपए सुरक्षा गार्डो पर खर्च करते हैं। यही नहीं वर्ष 2007 में सरकार ने संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति पर रोक लगा दी थी, इसके बावजूद हरिनाम बाबू मिश्र ने शासनादेशों को दरकिनार कर 16 नियुक्तियां कर डाली थीं। इन नियुक्तियों में धन उगाही भी की गई।

Friday, 25 March 2011

हैरत : यूपी में नहीं है गुटखा फैक्ट्री!


यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसर गुटखा निर्माता कम्पनियों को सर्टीफिकेट बांटते फिर रहे हैं कि वे निर्दोष हैं और प्रदेश के पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुंचा रहे हैं। कमीशनखोर अफसर कैंसर जैसी घातक बीमारियों के जरिए मौत बाट रहे गुटखा निर्माताओं की पीठ थपथपाने में लगे हैं और कह रहे हैं कि प्रदेश में श्याम बहार, पुकार, राजश्री, कमला पसंद व हरसिंगार गुटखा की फैक्ट्री ही नहीं है जबकि राजधानी में ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नाक केनीचे फैक्ट्रियां चल रही हैं। अधिवक्ता एसपी मिश्र द्वारा आरटीआई के तहत मांगी गई सूचनाओं के विपरीत यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गुटखा निर्माताओं की भाषा में जो जवाब दिया है वह अफसरों की सांठगांठ की ओर इशारा करता है।

श्री मिश्र ने बोर्ड से पूछा कि राजश्री, कमला पसंद, श्याम बहार, हर सिंगार आदि की प्रदेश में कुल फैक्ट्रियों की संख्या, बीते तीन वर्षो में दिए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र, पान मसाला कम्पनी की मशीनों व पैकिंग रेपर के प्रदूषण मानकों का पालन करने की नियमावली, बोर्ड द्वारा समय-समय पर की गई कार्रवाई की जानकारी दें। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बड़ी चतुराई के साथ इस विवाद से पीछा छुड़ाते हुए क्षेत्रीय इकाइयों पर जवाब देने की जिम्मेदारी थोप दी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बरेली के क्षेत्रीय अधिकारी अनिल कुमार चौधरी ने जवाब दिया कि उनके जिले में कोई भी गुटखा व पान मसाला की फैक्ट्री नहीं है। बुलंदशहर बोर्ड ने भी जवाब में ना कहा। मिर्जापुर के क्षेत्रीय अधिकारी कालिका सिंह ने कहा कि गुटखा की कोई फैक्ट्री नहीं है। वाराणसी के क्षेत्रीय अधिकारी एसबी सिंह ने कहा पान मसाले का कोई भी उद्योग चिन्हित नहीं है। मेरठ के क्षेत्रीय अधिकारी विवेक राय ने बताया कि गुटखा कम्पनी के नाम से कोई उद्योग मेरठ के अभिलेखों में नहीं है। मुजफ्फरनगर के क्षेत्रीय अधिकारी एके तिवारी ने कहा कि गुटखा उत्पादन करने वाला कोई भी उद्योग कार्यरत नहीं है। सहारनपुर का भी चार्ज देख रहे श्री तिवारी ने कहा कि यहां भी कोई फैक्ट्री नहीं है। मगर लखनऊ की क्षेत्रीय इकाई ने थोड़ा साहस दिखाते हुए कहा है कि श्याम बहार को अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया गया है। गुटखा की मशीनों व पैकिंग रेपर के प्रदूषण सम्बंधी कोई मानक नहीं है।

इसके साथ ही लखनऊ के क्षेत्रीय अधिकारी एसके सिंह ने बताया कि पर्यावरणीय प्रदूषण के तहत अधिनियमों के अनुसार अनापत्ति प्रमाण पत्र उद्योग स्थापना से पूर्व प्रस्तावित स्थल प्राप्त किए जाने का प्राविधान है। इसी तरह उन्नाव, आगरा, कानपुर, रमाबाई नगर, झांसी, मथुरा, मुरादाबाद, बिजनोर और गाजियाबाद समेत प्रदेशभर में कहीं भी पान मसाला की फैक्ट्रियां नहीं हैं। अब सवाल यह उठता है कि अगर फैक्ट्रियां नहीं हैं क्या ये प्रदेश के बाहर से आ रहे हैं? जबकि स्थिति यह है कि लखनऊ स्थित तालकटोर इंडस्ट्रियल एरिया, अमौसी, राजाजीपुरम आदि इलाकों में गुटखा फैक्ट्रियां हैं। दूसरे, गुटखा निर्माता मसालों के पाउच पर उत्पादन स्थल का कोई जिक्र नहीं है।

Thursday, 24 March 2011

अफसरी के साथ-साथ चौकीदारी की जिम्मेदारी

मनरेगा समेत विभिन्न योजनाओं पर रखेंगे नजर
तीन-तीन ग्राम पंचायतों के प्रभारी बने अफसर

यह शायद केंद्र की यूपीए सरकार और कांग्रेस के लगातार हमलों का ही असर है कि गांव में चलने वाली केंद्रीय योजनाओं को लेकर राज्य सरकार ने फर्जी ड्रामेबाजी शुरू कर दी है। केंद्र से पैसे ऐठने और विकास के प्रभावी क्रियान्वयन का बहाना लेकर ही मनरेगा समेत तमाम योजनाओं पर नजर रखने के लिए सरकार ने अफसरों को चौकीदारी करने की जिम्मेदारी दे दी है। खंड विकास अधिकारी से लेकर ग्राम्य विकास विभाग से जुड़े सभी आईएएस और पीसीएस अफसरों को तीन विकास खंड और तीन ग्राम पंचायतें सौंपी गई हैं।

राज्य सरकार द्वारा जिलाधिकारियों को लिखी गई चिठ्ठी में यह तो बिलकुल साफ हो ही गया है कि केंद्र की यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी अगर यूपी में केंद्रीय योजनाओं पर आवंटित धन के बंदरबांट का आरोप लगा रही है तो वह मनगढ़ंत नहीं है। सरकार की तरफ से अनुसचिव आरपी सिंह ने जिलाधिकारियों को लिखे पत्र में कहा है कि ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम्य विकास विभाग की योजनाओं का क्रियान्वयन शासन की मंशानुरूप प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा है। योजना के क्रियान्वयन न होने के कारण लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसलिए निर्णय लिया गया है कि खंड विकास अधिकारी से लेकर उच्च स्तर के अधिकारी तीन-तीन ग्राम पंचायतों जिनमें एक अंबेडकर ग्राम पंचायत होगी, के वे प्रभारी के रूप में कार्य करेंगे। अनुसचिव ने डीएम को लिखा है कि ग्राम पंचायतों का आवंटन खंड विकास अधिकारियों एवं अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारियों के लिए मुख्यालय से किया जा रहा है।

सूत्र बताते हैं कि मुख्यालय स्तर से जिन बड़े अफसरों को योजनाओं की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया है उनमें अब विभाग से हट चुके पूर्व सचिव मनोज कुमार सिंह को सोनभद्र जिले के विकास खंड क्रमश: चोपन व म्योरपुर, ग्राम्य विकास आयुक्त संजीव कुमार को बाराबंकी के बनी कोडर व रामनगर, अपर आयुक्त अनुराग यादव को बहराइच के शिवपुर व बलहा, अपर आयुक्त प्रशासन बादल चटर्जी को कौशाम्बी के सरसवां, विशेष सचिव आरएन सिंह को इलाहाबाद के करछना व बहरिया, संयुक्त सचिव सीताराम यादव को चंदौली के नौगढ़ व बरहनी, अपर आयुक्त महेश अग्निहोत्री को कानपुर देहात के मलासा, श्रवण खेड़ा व अकबरपुर, अपर आयुक्त बलिराम को जालौन के महेवा, रामपुरा व कदौरा, उपसचिव डीपी सिंह को कांशीरामनगर के सिढ़पुरा व अमापुर, अनुसचिव आरपी सिंह को जौनपुर के जलालपुर व महराजगंज, अनुसचिव राम सेवक को बरेली के शेरगढ़, रामनगर व भुता, वरिष्ठ उपायुक्त भारत यादव को छत्रपतिशाहूजी महराजनगर के तिलोई व शाहगढ़, वरिष्ठ उपायुक्त केएन लाल को हमीरपुर के कुरारा, मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी शिवाकांत शुक्ला को रायबरेली के अमावा व बछरावां, उपायुक्त जगदीश सिंह को मिर्जापुर के कोन व राजगढ़, उपायुक्त सुभाष श्रीवास्तव को शाहजहांपुर के बांदा व जलालाबाद, उपायुक्त वीके सिंह को अंबेडकरनगर के टांडा व रामनगर, उपायुक्त वीके भागवत को वाराणसी के अराजलाइन व चिरगांव, सहायक आयुक्त पीके सिंह को उन्नाव के सुमेरपुर व नवाबगंज, सहायक आयुक्त अरविंद कुमार को कानपुर नगर के ककवन व विधनू, सहायक आयुक्त जगदीश त्रिपाठी को हरदोई के बावन व माधोगंज, सहायक आयुक्त सुशीला सिंह को आगरा के अचनेरा, आकोला व फतेहपुर सीकरी, सहायक आयुक्त प्रतिभा सिंह को सीतापुर के कसमंडा व पिसावां, लेखाधिकारी युग्गीलाल दीक्षित को श्रावस्ती के मिलौमा व हरिहरपुरसनी समेत 31 बड़े अफसरों को इन विकासखंडों की जिम्मेदारी दी गई है तथा ये अधिकारी अपने मातहत छोटे अफसरों को तीन-तीन ग्राम पंचायतों की देखरेख के लिए जिम्मा सौंपेंगे।